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मन में निर्मलता कैसे लाये ? - How to bring clarity in mind?




[caption id="" align="aligncenter" width="457"]मन की निर्मलता - Clarity of mind, in Hindi मन की निर्मलता - Clarity of mind, in Hindi[/caption]


निर्मल ह्रदय (clean heart) खुले आकाश (sky) की भांति (like) पारदर्शी (transparent) होता है. उसमे छिपने-छिपाने की कोई बात नहीं होती है. निर्मल ह्रदय (clean heart) वाले का अंतरंग (inner) ऐसा अन्त:पुर होता है जहाँ सबकी सहज (spontaneous) पहुँच होती है. माता-पिता का दिल पुत्र (son) के लिए और परम पिता का दिल सबके लिये ऐसा ही होता है.

संतजन (sage) ईश्वर के अवतार (incarnation) होता है, उनका दिल-दरबार सबके लिये खुला होता है. वे यह निर्मलता (cleanness) का प्रसाद सबको बांटते फिरते है. उनके सत्संग से यह निर्मलता अनायास (suddenly) प्राप्त होती है. निर्मलता से जीव में निर्भयता (fearlessness) आती है, आत्मा विश्वास (self confidence) आता है. बंधनों से मुक्ति (release) मिलता है.

यह सत्संग है. यहाँ हर जीव माया के प्रबल प्रवाह (strong floe) में बहा जा रहा है. न चाहते हुए भी भूलें (forget) होती रहती है. कभी गुरु में अश्रद्धा (faithless), कभी ईश्वर में अविश्वास (disbelief), कभी की हिंसा (violence), राग-द्वेष, काम, क्रोध (anger), लोभ (greed) के ज्वार-भाटे, आदि माया के अनेकों चक्रवात (cyclone) में फंसा हुआ जीव चाहकर भी अपने लक्ष्य (goal) तक नहीं पहुँच पाता.

वह किसी अज्ञात शक्ति (unknown power) से विवश (helpless) होकर सब कुछ करता जाता है और जीवन की चादर मैली करता रहता है जहाँ उसकी सफाई होती है. जो जीव इस दरबार में पहुँच गया, उसका सौभाग्य (prosperity) है. उसका ह्रदय निर्मल हो गया.

 

मन की निर्मलता - Clarity of mind, in Hindi


कुछ लोग इस मैले (dirty) को अपने सिर पर ढोए रखते है. सोचते है कि मैं बड़ा पापी (sinful) हूं, बड़े गुनाह (crime) किए है, कैसे जाऊं उनके सम्मुख (front) ? वे भला क्या कहेंगे ? मुझे दूर से ही भगा देंगे. इच्छा होते हुए भी उनके सम्मुख जाने से डरता (fear) है, शर्म (shame) करता है और मुहं छिपाता फिरता है. वह यह नहीं जानता कि गुरु उसे कितना चाहते है, कितना प्यार (affection) करते है, उनका दिल उसके लिये कितना तड़पता (aggrieved) है. '

वह उसी के लिये यहाँ आए है. और वह अपने को अपराधी (criminal) मानकर दूर-दूर भागता-फिरता है. उचित (suitable) तो यह है कि वह गुरु के सम्मुख (front) जाए और चरणों में गिरकर क्षमा (excuse) मांग ले. वह क्षमा सिन्धु है, क्षमा अवश्य (sure) करेंगे और निहाल कर देंगे.

 

सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत (Rishimuk Mountains) की ओर निर्वासित जीवन (exiled life) व्यतीत (spend) कर रहा था. भगवान राम की सहायता (help) से जब उसे अपना राज्य (kingdom) वापस मिल गया, पत्नी वापस मिल गयी तो वह विषय-भोग (sensuality) में लिप्त (involved) हो गया और वह राम को भी भूल (forget) गया.

सीता की खोज (search) करने का अपना वादा (promise) भी भूल गया. तीन-चार महीने बीत गये, मगर वह एक बार भी उन्हें देखने नहीं गया कि वे किस हाल (situation) में है, कैसे है ? उसके ऐसे आचरण (manner) से खिन्न (sad) होकर एक दिन भगवान राम क्रोध (anger) के स्वर (voice) में लक्ष्मण से बोले - ' लक्ष्मण ! सुग्रीव तो अपना राज्य (kingdom) पाकर हमें भूल ही गया. लगता है कि वह हमें पहचानता (recognized) नहीं है. जिस बाण (arrow) से बाली को मारा था, उसी बाण से उसे भी मार गिराऊंगा. ' 

उनके मुख (mouth) से ऐसा सुनते ही लक्ष्मण धनुष-बाण (bow and arrow) लेकर उठ खड़े हुए. तब भगवान राम ने उन्हें समझाया (explained) - लक्ष्मण ऐसा करना ठीक नहीं है. वह हमारा मित्र (friend) है. बस उसे डरा-धमकाकर (intimidating) मेरे पास ले आओ. उनके नगर में जाते ही हड़कंप (stirred) मच गया. सबको राम याद आ गए, सुग्रीव को भी अपना वादा (promise) याद आ गया.

सुग्रीव डरते-डरते (scared) लक्ष्मण के सामने आया. लक्ष्मण उसे धमकाते (threats) हुए राम के पास ले आए. सुग्रीव डरते-डरते राम के सम्मुख (front) आया. सम्मुख आते ही जैसे उसमे निर्भयता (fearlessness) आ गयी. वह हाथ जोड़कर सिर झुकाकर विनती (solicitation) भाव से बोला - ' क्षमा करें प्रभु ! मुझसे भरी भूल हो गयी है. मगर इस भूल के लिए में एकदम दोषी (guilty) नहीं हूं. हे नाथ! आपकी माया इतनी प्रबल (predominant) है कि उसके आगे जीव (creatures) का कोई वश (power) नहीं चलता. यह भूल (mistake) उसी के कारण हुयी है. आपकी दया होती है, तभी उससे जीव मुक्त (liberated) हो पाता है. '

 

उसकी ऐसी निर्भय (fearlessness) और सत्यवाणी /(truth) सुनते ही भगवान राम प्रसन्न (happy) हो गए, और मुस्कुराते (smiling) हुए बोले - ' सुग्रीव तुम बहुत अच्छे मित्र (friend) हो. तुम मुझे भाई भरत जैसे प्रिय (amiable) हो. ' उसे पास बिठाया और प्यार (affection) दिया. ऐसा होता है महापुरुषों का क्रोध (anger) और प्यार. उनका क्रोध सोए (slept) हुओं को जगाने (awake) वाला होता है, भटके (stray) हुओं को चेताने (consciously) वाला होता है.

जीव जीव ही है, वह सर्वशक्तिमान परमात्मा (almighty god) नहीं है. उसका निवास जिस मायामय संसार में है, वहां उसमे गलतियाँ (mistakes) होती रहती है, होती ही रहेंगी. गलती होना उसके स्वभाव (nature) में है. वह न चाहकर भी कभी काम (sexual desire) के रास्ते पर, कभी क्रोध (anger) और लोभ (greed) के रास्ते पर, कभी मोह (attachment) और अहंकार (ego) के रास्ते पर, ज्ञान (knowledge) और अज्ञान (ignorance) के रास्ते पर बार-बार फिसलता (slips) रहता है. बड़े-बड़े महापुरुष, ज्ञानी-ध्यानी , योगी-तपस्वी भी नहीं संभल (careful) पाये तो साधारण आदमी (common man) की क्या बात ?

 

इसीलिये भगवान यह सब नहीं देखते, सम्मुख (front) होते ही मुस्कराकर (smiling) यह सब भुला देते है. वह अच्छी तरह जानते है कि जीव (creature) कितना विवश (helpless) है. वे जीव की गलतियाँ (mistakes) नहीं गिनते, बस बार-बार उसका ह्रदय (heart) ही देखते है कि वह कितना साफ (clean) है, कितनी सच्चाई (reality) है उसमें.

मगर जीव अपने को ही कर्ता (performer) मान बैठता है और अहंकार वश (egoism) ईश्वर और गुरु के सम्मुख (front) आ नहीं पाता. बस पाप-ताप के भरी बोझ (burden) को अपने सिर पर लादे हुए भटकता रहता है.

ह्रदय में सफाई नहीं है, उसमे छिपाव (hidden) है, दुराव (repeal) है, मुंह छिपाने का भाव है. वह अपने को पापी (sinner) मानकर सम्मुख (front) आने से डरता रहता है मुंह छिपाता रहता है, अरे पिता से मुंह छिपाकर रहता है कहां रहोगे ? उसका राज्य (kingdom) कहां नहीं है ? इसीलिए उचित (suitable) यह है कि सुग्रीव की तरह अहंकार (ego)  त्यागकर विनीत (respectful) बनकर उसके सम्मुख (front) हो जा और जो कुछ अच्छा-बुरा हुआ है, सबको उसके चरणों में डाल दे, सबका सहारा उसी के गले में डाल दे.

 

संतजन (sage)कहते है कि संसार एक रंगमंच (stage) है. इस पर सारे प्राणी अपना-अपना रोल (role) निभा रहे है. उनका जो वेष (look) है, वह असली (real) नहीं है. उनका जो व्यवहार (behavior) है, वह भी एक स्वांग मात्र (drama) है. इस पर जो लड़ाई (fight) हो रही है, राग-द्वेष का जो खेल (game) हो रहा है, वह भी नकली (fake) है.

इसीलिए यहाँ कोई दोषी (guilty) नहीं है. मगर दोष (fault) आता है जब हम इस रोल (role) को ठीक नहीं निभा पाते. रोल से मोह (attachment)  कर लेते है, उसे सच्चा मानकर ढोते (carry) रहते है. उसे दिल के अन्दर बसा लेते है. लोगों से सचमुच राग-द्वेष कर लेते है. हम सब एक है, यह बात भुला (forgotten) देते है.

 

हम सोचते है कि साफ दिल (clean heart) तब होगा, जब अन्दर से काम (sexual desire) चला जाए, राग-द्वेष सब मिट जायें. ऐसा सोचना (thinking) गलत है. ये कभी नहीं जा सकते. ये कमजोर (weak) पड़कर छुपकर कही न कही रहेगा. ये सब प्रकृति (quality) के गुण है. जब तक प्रकृति रहेगी, यह शरीर (body) रहेगा और ये गुण (quality) भी रहेंगे.

साफ दिल तो वह है जो सत्य वचन (true words) बोलता है, जो अपने दोषों (fault) को भी खुले दिल से स्वीकारता (accept) है, जो सबके सामने अपनी गंदी चादर का भी इजहार करने में शर्म (shame) नहीं करता. जिनका पिता (god) में पूर्ण विश्वास (total believe) है, जिनमें कर्त्तापन (creativity) का अभिमान (ego) नहीं है. जिनके जीवन में खुलापन (openness) है, जिनका अन्दर-बाहर एक है, जिनका शत्रु (enemy) और मित्र (friend) में समानभाव है.

काम-क्रोधादि (sexual desire and anger) रहते हुए भी ऐसे लोग परम पवित्र है, पिता (god) के परम प्यारे है. सिर्फ भजन और ध्यान करने वाला भी निर्मल नहीं, जब तक अन्तःकरण (incantation) स्वच्छ न हो. जब तक हम में छिपने (hiding) की प्रवृत्ति (tendency) है, छिपाने की प्रवृत्ति है, तब तक हम कपटी (insidious) है, मलिन ह्रदय (dirty heart) वाले है. तब तक हम अज्ञानी (ignorant) भी है क्योंकि वह अन्यर्यामी बिना बताए भी सब कुछ जान रहा है, सब कुछ देख रहा है और हम है कि उसे नकार (negation) रहे है.

निर्मल होना चाहते हो तो जैसे हो वैसे ही गुरु परमात्मा (god) के सामने आकर नत मस्तक हो जाओ. उसमे पूर्ण विश्वास (total believe) ले आओ और अपने सारे किए-कराये को उसके चरणों में डाल दो.

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